Director Roland Emmerich might have set this action epic in prehistoric times, but audiences can expect plenty of high tech special effects in this film from the man that brought INDEPENDENCE DAY and THE DAY AFTER TOMORROW to the screen.


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व्यक्ति एक बार में बैठे थे ……एक ने कहा
….” यार…. बहुत फेमिली प्रॉब्लम है “..
दूसरा व्यक्ति : तु पहले मेरी सुन……..
मैंने एक विधवा महिला से शादी की जिसके एक लड़की थी …
कुछ दिनों बाद पता चला कि मेरे पिताजी को उस विधवा महिला कि पुत्री से प्यार है ….और उन्होने इस तरह मेरी ही लड़की से शादी कर ली …
अब मेरे पिताजी मेरे दामाद बन गए और मेरी बेटी मेरी माँ बन गयी….और मेरी ही पत्नी मेरी नानी हो गयी !!
ज्यादा प्रॉब्लम तब हुई जब जब मेरे लड़का हुआ ..अब मेरा लड़का मेरी माँ का भाई हो गया तो इस तरह मेरा मामा हो गया …….
परिस्थिति तो तब ख़राब हुई जब मेरे पिताजी को लड़का हुआ ….मेरे पिताजी का लड़का यानी मेरा भाई मेरा ही नवासा( दोहिता ) हो गया और इस तरह मैं स्वयम का ही दादा हो गया और स्वयम का ही पोता बन गया …..
…….” और तू कहता है कि तुज्हे फेमिली प्रॉब्लम है ….”
अजीब शख्स हूँ खुद को जलाना चाहता हूँ ,
मैं खुद को रख कर कहीं भूल जाना चाहता हूँ ,
मेरे नसीब की खुशियाँ भी कब मिली मुझको ,
बस अब तो उमर भर आंसू बहाना चाहता हूँ ,
नाजाने कितनी मोहब्बत है रंज - ओ - गम है मुझे ,
कोई भी दर्द हो दिल में छुपाना चाहता हूँ ,
बहा बहा के यह आंसू बिखर चुका है बहुत ,
सिमट के अपने आप में अब मुस्कुराना चाहता हूँ ,
जिसे एक उमर से दिल में बसा के रखा है ,
वो राज़ आज मैं सब को बताना चाहता हूँ ,
वही याद है जो अच्छा कहा है लोगो ने ,
बकाया सारे सितम भूल जाना चाहता हूँ ,
मुझे ज़माने ने पत्थर समझ लिया है मगर ,
मैं एक इन्सान हूँ सब को बताना चाहता हूँ ,
जो मुझ से रूठ चुकी हैं ज़माने की खुशियाँ ,
तो मैं भी खुशियों से अब रूठ जाना चाहता हूँ ,
वो मेरी ख्वाहिशें वो मेरा खुवाब वो मेरा बेचैनी ,
उमर रफ्ता में फिर से वो पाना चाहता हूँ ,
कोई तो हो जो मुझे भी लगाये सीने से ,
किसी को मैं भी गम अपना सुनाना चाहता हूँ !!!